कई बार केवल श्लोक पढ़ने से भ्रांतियां हो सकती हैं, लेकिन प्रामाणिक हिंदी व्याख्या संशयों को दूर करती है।
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आत्मा अजन्मा, अमर और अविनाशी है। इसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु।
ग्रंथ बार-बार इसी बात पर जोर देता है कि आत्मा ही परब्रह्म है। साधक का लक्ष्य 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) के इस सत्य को जीना है। 'अवधूत' की स्थिति में पहुँचा व्यक्ति कहता है, "मैं ही शुद्ध चैतन्य हूँ, मुझे किसी और का नमस्कार नहीं करना है, क्योंकि कोई दूसरा ही नहीं है"।