Music began for Segun Johnson at a tender age as a local drummer in the church. His musical journey evolved as he transitioned into singing at 24 and launched his professional career as a crossover live band artist at 25.
International Sensation: Segun has sold out venues across continents, including London's Broadway Theatre, Cargo Coventry (UK), Terra Kulture Arena (Lagos), and The Opera House (Toronto) - just a few among his many sold-out shows worldwide.
जब हम कर्बला के वाकये और इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत को याद करते हैं, तो 'ज़ियारत-ए-नाहिया' (Ziyarat-e-Nahiya) का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। यह ज़ियारत न केवल एक दुआ है, बल्कि यह कर्बला के मंज़र का वह आईना है जिसे खुद इमाम-ए-ज़माना (अतफ) ने बयान किया है।
इस्लामी इतिहास एवं साहित्य (अज़ादारी) विषय: ज़ियारत-ए-नाहिया का ऐतिहासिक एवं भावनात्मक महत्व
"आप अकेले थे, न कोई मददगार था, न कोई मदद करने वाला। आपने अपने पवित्र कंठ से पानी मांगा, लेकिन जालिमों ने आपको शहादत का जाम पिला दिया।" ziyarat e nahiya in hindi
सलाम हो उस सफ़ेद दाढ़ी पर जो खून से रंग गई थी।
ज़ियारत-ए-नाहिया की मुख्य विशेषताएँ और विषय न कोई मददगार था
इमाम महदी (अ.ज.) अशूरा के हर मर्हले को इतनी तफसील से बयान करते हैं कि जैसे वह खुद वहां मौजूद हों। आप सोच सकते हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) के सबसे करीबी रिश्तेदार (उनके बेटे, भाई और पोते) जिस तरह से शहीद हुए, उस दर्द को खुद इमाम महदी (अ.ज.) कितने गहरे अल्फाज़ में पेश करते हैं।
"ज़ियारत-ए-नाहिया" इस्लाम के इतिहास की एक ऐसी धरोहर है जो हमें अन्याय के खिलाफ खड़े होने और सत्य के मार्ग पर सब कुछ न्योछावर कर देने का हौसला देती है। हिंदी भाषा में इस ज़ियारत को समझने से भारतीय उपमहाद्वीप के लाखों हिंदी भाषी मोमिनीन को कर्बला के संदेश को अधिक गहराई से महसूस करने का अवसर मिलता है। अज़ादारी और मुहर्रम के दिनों में इस ज़ियारत का पाठ करना अत्यधिक पुण्यकारी माना जाता है। बल्कि पूरी कायनात
इस ज़ियारत में बड़ी खूबसूरती से यह दर्शाया गया है कि इमाम हुसैन (अ.) की शहादत पर केवल इंसान ही नहीं, बल्कि पूरी कायनात, आसमान के फरिश्ते, दरिया, पहाड़ और जानवर तक रोए。
जब हम कर्बला के वाकये और इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत को याद करते हैं, तो 'ज़ियारत-ए-नाहिया' (Ziyarat-e-Nahiya) का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। यह ज़ियारत न केवल एक दुआ है, बल्कि यह कर्बला के मंज़र का वह आईना है जिसे खुद इमाम-ए-ज़माना (अतफ) ने बयान किया है।
इस्लामी इतिहास एवं साहित्य (अज़ादारी) विषय: ज़ियारत-ए-नाहिया का ऐतिहासिक एवं भावनात्मक महत्व
"आप अकेले थे, न कोई मददगार था, न कोई मदद करने वाला। आपने अपने पवित्र कंठ से पानी मांगा, लेकिन जालिमों ने आपको शहादत का जाम पिला दिया।"
सलाम हो उस सफ़ेद दाढ़ी पर जो खून से रंग गई थी।
ज़ियारत-ए-नाहिया की मुख्य विशेषताएँ और विषय
इमाम महदी (अ.ज.) अशूरा के हर मर्हले को इतनी तफसील से बयान करते हैं कि जैसे वह खुद वहां मौजूद हों। आप सोच सकते हैं कि इमाम हुसैन (अ.स.) के सबसे करीबी रिश्तेदार (उनके बेटे, भाई और पोते) जिस तरह से शहीद हुए, उस दर्द को खुद इमाम महदी (अ.ज.) कितने गहरे अल्फाज़ में पेश करते हैं।
"ज़ियारत-ए-नाहिया" इस्लाम के इतिहास की एक ऐसी धरोहर है जो हमें अन्याय के खिलाफ खड़े होने और सत्य के मार्ग पर सब कुछ न्योछावर कर देने का हौसला देती है। हिंदी भाषा में इस ज़ियारत को समझने से भारतीय उपमहाद्वीप के लाखों हिंदी भाषी मोमिनीन को कर्बला के संदेश को अधिक गहराई से महसूस करने का अवसर मिलता है। अज़ादारी और मुहर्रम के दिनों में इस ज़ियारत का पाठ करना अत्यधिक पुण्यकारी माना जाता है।
इस ज़ियारत में बड़ी खूबसूरती से यह दर्शाया गया है कि इमाम हुसैन (अ.) की शहादत पर केवल इंसान ही नहीं, बल्कि पूरी कायनात, आसमान के फरिश्ते, दरिया, पहाड़ और जानवर तक रोए。